गुरुवार, 6 अक्तूबर 2011

एक दीप अँधेरे में ...


एक दीप अँधेरे में ...
बरसों से मंदिर के कपाट में 
एक दीप अँधेरे में जल रहा है 
रोशनी की तलाश में भटककर खुद से लड़ रहा है 
कितने दिन बीत गए ...
अपने रूप को , आईने में नही देख पाया 
थोड़ा सा तेल 
वहीं पुरानी बाती 
उसी कपाट पर 
बंद , पडा अपनी दशा से परेशान
फिर भी धीमें -धीमें  जल रहा है 
उस उजले दिन की इंतजार में 
बुझता और जलता 
नया सबेरा ढूंढ़ रहा है 
बरसों से मंदिर की कपाट में 
एक दीप अँधेरे में जल रहा है 

 लक्ष्मी नारायण लहरे "साहिल " 

4 टिप्‍पणियां:

shephali ने कहा…

Good..............
--Mere Shabd

NISHA MAHARANA ने कहा…

बुझता और जलता
नया सबेरा ढूंढ़ रहा है
good.

Dr.J.P.Tiwari ने कहा…

घबराओ नहीं प्यारे!
मैं हू ऐसा दीप जो सतत जलता रहा,
कभी बिन तेल, कभी बिन बाती जलता रहा.
जलता रहा हूँ अंतर्मन में तेल के भी.
जलाता रहा बत्ती अपनी बिना तेल के भी.
तेल की तली को भी मै खूब जालाता रहा,
चिराग टेल जो अंघेरा था, उसे मिटाता रहा.

जलना मेरा कभी नजर आया, कभी नहीं आया
सच तो यही है, कभी बुझा नहीं, जलता रहा.
हवा के झोंको - थपेड़ों से बुझा नहीं कभी,
वर्षा, आंधी, तूफ़ान में भी उड़ा नहीं कभी.
नेह भरी तेल में,लेकिन बत्ती सहित डूब गया.
देने वालों ने सारा दोष दीपक को ही दिया.

JHAROKHA ने कहा…

aadarniy sir
bahut hi behtreen lagi aapki yah post.sach to yah hai ki deepak ke jeevan ka lakxya hi yahi hai nirantar jalte rah kar dusron ke ghar me ujaala karna.
bahut bahut hardik badhai
aadarniy mahendra ji , aapka aadha sach wala blog punah nahi khul raha hai mujhe kripya bataayen ki aisa kyon ho raha hai.
dhanyvaad sahit
poonam